Monthly Archives: December 2016

प्रकृति प्रकृति नहीं है…..

अद्भुत, अप्रतिम, अद्वितीय यह प्रकृति मात्र वृक्षों एवं जीवों का समुच्चयन नहीं है….. 

यह सार है उन वृक्षों से टपकती वर्षा की बूँदों का जिनमें संगीत है किसी भी वादनयंत्र की ध्वनियों को पीछे छोड़ देने का…

यह दृश्य है उन अकल्पनीय सत्यों का जो जीवन से विरक्ति उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं….

ये केवल कलकल करती नदियों का संगीत नहीं है, ये अनुभव है उसी नदी में बैठे बगुले की चातुर्यता का…..

मात्र कोयल मन को प्रसन्न नहीं कर सकती यदि कौए का कर्कश स्वर उसकी मधुरता का महत्व न बढा़ए….

मात्र सवेरे की लालिमा संतुष्टि नहीं देती यदि पूर्वकालीन रात्रि गहरी न हो……

वृक्षों की हरियाली हरी है तो केवल विस्तृत रेगिस्तान से….

वर्षा का महत्व है केवल सूखे से दरक चुकी शुष्क चटकी भूमि में….

प्रकृति तब तक प्रकृति नहीं है जब तक कि मानव का अस्तित्व अक्षम है उसकी आंतरिक गहराइयों को छू पाने में…..

और मानव तभी तक मानव है जब तक कि अन्य प्रजातियाँ रोक रहीं हैं स्वयं को आगे बढ़ने से……